।। नमस्कार ।।
गृहस्थ आश्रम में कैसे रहना चाहिए-------
आइये इस विषय पर बात करते हैं।
यह मनुष्य - शरीर और इसमें भी गृहस्थाश्रम उद्धार करने की पाठशाला है। भोग भोगने और आराम करने के लिए यह मनुष्य शरीर नहीं है।
'एहि तन कर फल विषय न भाई।'
अर्थात------ शास्त्र रहित यज्ञ आदि कर्म करके ब्रह्मलोक आदि लोको की प्राप्ति करना भी खास बात नहीं है; क्योंकि वहां जाकर फिर पीछे लौट कर आना पड़ता है-----
'आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनः।'
अर्थात------- अतः प्राणी मात्र के हित की भावना रखते हुए गृहस्थ आश्रम में रहना चाहिए और अपनी शक्ति के अनुसार तन,मन, बुद्धि, योग्यता, अधिकार आदि के द्वारा दूसरों को सुख पहुंचाना पहुंचाना चाहिए। दूसरों की सुख- सुविधा के लिए अपने सुख का त्याग करना ही मनुष्य की मनुष्यता है।
कल फिर मिलेंगे आज के लिए इतना ही शुभरात्रि ।
।। नमस्कार ।।
।। जय महाकाल ।।
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