कल मैंने पूछा था कि विवाह क्यों करें? क्या विवाह करना आवश्यक है?
आज इसके बारे में जानकारी दी जाएगी----
हमारे धर्म में दो तरह के ब्रह्मचारी होते हैं। ---
१- नैष्ठिक और २- उपकुर्वाण।
जो आजिवन ब्रह्मचर्य काम पालन करते हैं, वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहलाते हैं और जो विचार के द्वारा भोग की इच्छा को पूरा करते हैं वे उपकुर्वाण ब्रह्मचारी कहलाते हैं। तात्पर्य यह है कि जो विचार के द्वारा भोग इच्छा को ना मिटा सके वह विवाह करने कर के देख ले, वह करके देख ले जिससे यह अनुभव हो जाए कि भोग इच्छा भोग भोगने से मिटने वाली नहीं है। इसलिए गृहस्थ के बाद वानप्रस्थ आश्रम में जाने का विधान कहा गया हैं। सदा गृहस्थ में ही रहकर भोग भोगना मनुष्यता नहीं है।
जिसके मन में भोग इच्छा है अथवा जो वंश परंपरा चलाना चाहता है और वंश परंपरा चलाने के लिए उसका कोई भाई नहीं है, उसको केवल भोग इच्छा मिटाने के उद्देश्य से अथवा वंश परंपरा चलाने के लिए विवाह कर लेना चाहिए। अगर उपर्युक्त दोनों इच्छाएं न हों तो विवाह करने की जरूरत नहीं है। शास्त्रों में निवृत्ति को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है -------
'निवृत्तिस्तु महाफला।'
आज के लिए इतना ही और कल के लिए आपको एक प्रश्न पूछता हूं---
कलयुग में तो सन्यास लेने से मना किया गया है? अतः मनुष्य निवृत्ति कैसे करें?
Sunday, 23 April 2017
विवाह क्यों करना चाहिए?
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