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Tuesday, 25 April 2017

गृहस्थ का खास धर्म

आज हम चर्चा करने जा रहे है गृहस्थ के खास धर्म के बारे में-------

प्रारब्ध पहले रचा , पीछे रचा सरीर।
तुलसी चिंता क्यों करे, भज ले श्री रघुवीर।।

अर्थात  -------      पहले पहल को बनाया बाद में शरीर को बनाया। तुलसी चिंता क्यों कर रहा है भगवान श्री राम को भजले फिर सब ठीक हो जाएगा।

ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास ----- इन चारों आश्रमों की सेवा करना गृहस्थ का खास धर्म हैं; क्योंकि गृहस्थ ही सबका माँ बाप है, पालक है, संरक्षक है अर्थात गृहस्थ से ही ब्रह्मचारी, गृहस्थ , वानप्रस्थ और सन्यासी उत्पन्न होते है और पालित और संरक्षित होते है। अतः चारों आश्रमों का पालन - पोषण करना गृहस्थ का खास धर्म है।
           अथिति - सत्कार करना; गाय-भैंस, भेड़-बकरी आदि को सुख सुविधा देना; उन सबका पालन - पोषण करना गृहस्थ का खास धर्म है। ऐसे ही देवता , ऋषि-मुनि की सेवा करना, पितरों को पिण्ड-पानी देना, भगवान की विशेषता से सेवा करना ( भगवान का भजन  और नाम जपना ) गृहस्थ का खास धर्म है।
             आज के लिए विश्राम
                  जय महाकाल
                   नमश्कार जी

Sunday, 23 April 2017

विवाह क्यों करना चाहिए?

कल मैंने पूछा था कि विवाह क्यों करें? क्या विवाह करना आवश्यक है?
आज इसके बारे में जानकारी दी जाएगी----
हमारे धर्म में दो तरह के ब्रह्मचारी होते हैं। ---
१- नैष्ठिक और २- उपकुर्वाण।
जो आजिवन ब्रह्मचर्य काम पालन करते हैं, वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहलाते हैं और जो विचार के द्वारा भोग की इच्छा को पूरा करते हैं वे उपकुर्वाण ब्रह्मचारी कहलाते हैं। तात्पर्य यह है कि जो विचार के द्वारा भोग इच्छा को ना मिटा सके वह विवाह करने कर के देख ले, वह करके देख ले जिससे यह अनुभव हो जाए कि भोग इच्छा भोग भोगने से मिटने वाली नहीं है। इसलिए गृहस्थ के बाद वानप्रस्थ आश्रम में जाने का विधान कहा गया हैं। सदा गृहस्थ में ही रहकर भोग भोगना मनुष्यता नहीं है।
जिसके मन में भोग इच्छा है अथवा जो वंश परंपरा चलाना चाहता है और वंश परंपरा चलाने के लिए उसका कोई भाई नहीं है, उसको केवल भोग इच्छा मिटाने के उद्देश्य से अथवा वंश परंपरा चलाने के लिए विवाह कर लेना चाहिए। अगर उपर्युक्त दोनों इच्छाएं न हों तो विवाह करने की जरूरत नहीं है। शास्त्रों में निवृत्ति को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है -------
'निवृत्तिस्तु महाफला।'
आज के लिए इतना ही और कल के लिए आपको एक प्रश्न पूछता हूं---
कलयुग में तो सन्यास लेने से मना किया गया है? अतः मनुष्य निवृत्ति कैसे करें?

Saturday, 22 April 2017

गृहस्थ जीवन के धर्म

                      ||नमस्कार||
आज में आपको इस श्लोक का अर्थ बताउगां जो कि गृहस्थ जीवन के धर्मो को बताएगा -----
घर में सब सुखी हैं, पुत्र बुद्धिमान् हैं, पत्नी मीठा बोलने वाली हैं, अच्छे मित्र हैं, अपनी पत्नी का संग हैं, नौकर आग्या मानने वाला हैं, हर रोज अतिथी सत्कार एवं शंकर भगवान् का पूजन होता हैं, पवित्र, सुन्दर एवं स्वादिष्ट खान - पान हें और नित्य ही सन्तों का संग किया जाता हैं ------ ऐसा जो गृहस्थ आश्रम हैं, वह धन्य हैं |
विवाह क्यों करें? क्या विवाह करना आवश्यक हैं?
इस प्रश्न का अगर उत्तर जानना चाहते हो तो हमारे साथ बनें रहिये------ कल आपको इसका उत्तर बताया जाएगा|
                       ||नमस्कार||

Thursday, 20 April 2017

गृहस्थ जीवन में कैसे रहे

how to live in married life
सबको मेरा नमस्कार | आज से मै आपसे गृहस्थ जीवन के बारे में चर्चा करने जारहा हु।
भगवान् शंकर मुण्डमाला एवं सर्प धारण किये हुए है और पार्वती सूंदर - सुन्दर आभूषण धारण  हुए है।  शंकर के पुत्र कार्तिकेय ६ मुख वाले तथा गणेश लम्बी सूंड और बड़े पैट वाले है। भगवन शंकर आदि के अपने अपने वाहन -----बैल , सिंह, मोर और मूषक आपस में एक -एक का भक्षण करने वाले है। ऐसा होने पर भी भगवान् शंकर के विभिन्न स्वभाव वाले परिवार में सदा एकता रहती है। इसी प्रकार गृहस्थ में विभिन्न स्वभाव वालों के साथ अपने अभिमान और सुखभोग का त्याग करके दूसरों के हित और सुख का भाव रखते हुए आपस में प्रेमपूर्वक एकता रहनी चाहिये।







आयो भगवान् की स्तुति करते है इस श्लोक से